गुलाबी नगरी जयपुर |

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राजस्थान का ऐतिहासिक नगर और अपनी कलात्मक शैली से सबका दिल जीतने वाले जयपुर को ‘पिंक सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस आलीशान शहर को कछवाहा महाराजा जयसिंह-दुितीय ने बसाया था।
यहाँ के प्रमुख स्थानों में –

सिटी महल

सिटी पैलेस में कछवाह राजपूत वंश के जयपुर के महाराज का सिंहासन है। आमेर पर सन् 1699 से 1744 तक राज करने वाले महाराज सवाई जय सिंह द्वितीय ने इस महल परिसर के निर्माण की शुरुआत करवाई थी। 1727 में पानी की समस्या और जनसंख्या में वृद्धि के कारण वह आमेर से जयपुर स्थानांतरित हो गए। यह परिसर कई एकड़ों में फैला है। उन्होंने पहले इस परिसर की बाहरी दीवार के निर्माण का आदेश दिया था। उन्होंने सिटी पैलेस के वास्तुशिल्प डिजाइन का काम मुख्य वास्तुकार (Architect ) विद्याधर भट्टाचार्य को सौंपा था। इसका निर्माण सन् 1729 में शुरु हुआ और इसे पूरा करने में तीन साल लगे। यह महल परिसर पूरी तरह से बनकर सन् 1732 में तैयार हुआ।

हवामहल

मंदिर की वास्तु कला -हवा महलहवामहल तैयार हुआ तो इसका बाहरी और भीतरी सुंदरता देखते बनती थी। पांच मंजिला यह इमारत 87 फीट ऊंची है। कभी किसी देवमुकुट की तरह तो चौथी और पांचवी मंजिल के बाद यह जिस तरह सिकुड़ती जाती है उससे पिरामिड जैसे आकार का आभास देती है। हवा महल एक ऐसी अनूठी अद्भुत इमारत है, जिसमें मुगल और राजपूत शैली स्थापित्य है। 15 मीटर ऊंचाई वाले पांच मंजिला पिरामिडनुमा महल के वास्तुकार लाल चंद उस्ताद थे।

जलमहल

इस झील की सुंदरता उस समय के राजाओं के आकर्षण का केंद्र थी और राजा अक्सर नाव में बैठ इसकी सैर किया करते थे, जिससे उनको क्षणिक आनंद की प्राप्ति होती थी, लेकिन राजा ‘सवाई जयसिंह’ ने झील के बीचों बीच महल बनाने का निश्चय किया ताकि वह अश्वमेघ यज्ञ के बाद झील के मध्य में शाही स्नान कर सके. झील के बीच अपनी दास्ताँ सुनाता जलमहल पाँच मंज़िला इमारत है जिसकी 4 मंज़िल पानी के भीतर बनी हैं और एक पानी के ऊपर नज़र आती है.

जयगढ़ किला

जयगढ़ किला राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थल में से एक है और भारत के इतिहासिक स्मारकों में शामिल है। जयगढ़ किले का निर्माण जयपुर शहर को सुरक्षित करने के लिए किया गया था। मूल रूप से आमेर किले की रक्षा के लिए बनाया गया है, जयगढ़ किले की वास्तुकला आमेर किले के समान है। किले को दिया जाने वाला दूसरा नाम विजय किला है। किला का निर्माण सावन जय सिंह द्वितीय द्वारा 15वीं से 18वीं शताब्दी के बीच लाल रेत के पत्थरों का उपयोग कर बनाया गया था।