60 साल की उम्र में LIC बीमा एजेंट ने शुरू की ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी सोनालिका, आज हुए भारत के अमीरों की लिस्ट में शामिल

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दुनिया के अधिकतर लोग किस्मत के भरोसे होते हैं लेकिन कुछ गिने-चुने लोग खुद से अपनी किस्मत लिखने का दम रखते हैं. इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता कि ये किस माहौल में पैदा हुए, इनके लिए उम्र मायने नहीं रखती, इनके लिए गरीबी या कठिन परिस्थितियां इनके पैरों की बेड़ियां नहीं बनतीं. ये हर हाल में बस आगे बढ़ना जानते हैं. लक्ष्मण दास मित्तल एक ऐसा ही नाम है, जिन्होंने अपने हालातों से लड़कर सफलता का वो मुकाम हासिल किया जहां तक गिने-चुने लोग ही पहुंच पाते हैं.

आज सोनालिका जैसी बड़ी कंपनी के मालिक के रूप में पहचाने जाने वाले लक्ष्मण दास मित्तल कभी कर्ज़ के बोझ तले दब चुके थे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और उसका नतीजा आज पूरी दुनिया के सामने है. पंजाब के मोगा जिले के भिंडरकला गांव में 5 नवंबर, 1930 को जन्मे लक्ष्मण दास मित्तल के पिता हुकुम चंद अग्रवाल अनाज मंडी में ग्रेन डीलर थे. पारिवारिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी लेकिन इसके बावजूद हुकुम चंद ने अपने बेटे की शिक्षा का खास ध्यान रखा.

पढ़ने में थे होशियार

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पिता की प्रेरणा और उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर लक्ष्मण दास ने उस समय में भी इंग्लिश और उर्दू में एमए किया, जब लोग शिक्षा के महत्व को सही से समझ भी नहीं पाए थे. उन्होंने इंग्लिश में गोल्ड मैडल प्राप्त किया. उर्दू में भी वह अच्छे थे. आज भी उनका पढ़ाई-लिखाई से नाता जुड़ा हुआ है.

LIC एजेंट बनकर शुरू किया करियर

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पढ़ाई पूरी करने के बाद लक्ष्मण दास के पिता उन्हें किसी अच्छी नौकरी में देखना चाहते थे, लेकिन लक्ष्मण दास के मन में कुछ बड़ा करने की ललक थी. पहले तो उन्होंने परिवार की मदद करने और पिता की बात रखने के लिए 1955 में एलआईसी में बीमा एजेंट के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की. वह फील्ड ऑफिसर भी बने और विभिन्न राज्यों में नौकरी भी की. लेकिन, मन में अब भी कुछ बड़ा करने का जज़्बा था.

बिज़नेस में हुआ घाटा

यही वजह रही कि लक्ष्मण दास ने नौकरी में रहते हुए 1966 में अपना बिजनेस शुरू किया और खेती किसानी संबंधी मशीनें बनानी शुरू कर दीं. उन्होंने स्थानीय लोहारों की मदद से थ्रेसर बनाना शुरू किया. उन्हें उम्मीद थी कि उनका ये बिजनेस उन्हें बड़ा बना देगा लेकिन उनकी ये कोशिश तब नाकाम हो गई जब उनका धंधा साल भर में ही चौपट हो गया. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो लक्ष्मण दास मित्तल इस तरह कर्ज में नीचे डूब गए कि उन्हें खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा. आज हजारों करोड़ के मालिक लक्ष्मण दास के पास 1970 में मात्र 1 लाख की संपत्ति बची थी.

पिता के आंसुओं को देख किया फ़ैसला

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लक्ष्मण दास को बिज़नेस में घाटा होते देख उनके पिता हुकुम चंद अंदर से टूट गए और रोने लगे. पिता की आंखों में आंसू देख लक्ष्मण मित्तल की आत्मा रो पड़ी. उन्होंने उसी दिन तय कर लिया कि वो अपने माता-पिता दुनिया की सारी खुशियां देंगे. इसके बाद उन्होंने Sonalika Group को फिर से खड़ा करने की ठानी.

रिटायर होने के बाद बनाए ट्रेक्टर

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इस बार पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में काम करने वाले उनके एक दोस्त ने उनकी मदद करते हुए उनके थ्रेशर मशीन में कमियां खोज निकलीं. फिर उसमें सुधार करके नए थ्रेशर बनाए गए. इस बार सब कुछ सही था और इसका नतीजा ये देखने को मिला कि मित्तल की मशीनें खू़ब लोकप्रिय होने लगीं. मात्र 10 साल के अंदर सोनालिका थ्रेशर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका था.

थ्रेशर की कामयाबी के बाद किसानों का लक्ष्मण दास और उनकी कंपनी पर भरोसा बढ़ गया. अब किसान ये चाहते थे कि मित्तल की Sonalika Tractor के धंधे में भी हाथ आजमाया और किसानों के लिए ट्रैक्टर बनाए. किसानों को ये यकीन हो चुका था कि मित्तल जब ट्रैक्टर बनाएंगे, वो भी उच्च गुणवत्ता के होंगे.

आज हजारों करोड़ के हैं मालिक

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लक्ष्मण मित्तल 1990 में LIC से बतौर डिप्टी जोनल मैनेजर रिटायर हुए. 1994 में उन्होंने ट्रैक्टर बनाने की शुरुआत की. आज सोनालिका ग्रुप की नेटवर्थ 17,771 करोड़ रुपए के बराबर है. Sonalika ग्रुप 74 देशों में ट्रैक्टर एक्सपोर्ट करता है. पांच देशों में इसके प्लांट हैं और ग्रुप में 7 हजार कर्मचारी हैं. लक्ष्मण दास मित्तल एक समय भारत के 52वें सबसे अमीर शख्स थे. आज उनकी गिनती भारत के 77वें सबसे अमीर शख्स के रूप में होती है.

लक्ष्मणदास मित्तल ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई. इन गांवों में सोनालिका के ट्रैक्टर किसानों की पसंद रहे हैं. साल भर में 3 लाख से ज्यादा ट्रैक्टर बनाने वाली सोनालिक 50 हार्सपावर से ज्यादा की मशीने बनाने के लिए भी प्रसिद्ध रही है. भले ही लक्ष्मण दास मित्तल ने अपने कारोबार की कामान अपने बेटों और पोतों को सौंप दी है लेकिन वह आज भी 90 साल से ज्यादा उम्र के होने के बावजूद रोज कंपनी जाते हैं और वहां का कामकाज देखते हैं.

लक्ष्मण दास ने क्या कामयाबी पाई है इसके बारे में उन्होंने ने एक बार अपने एक साक्षात्कार में बताते हुए कहा था कि, ‘एक बार उन्होंने मारुति उद्योग में डीलरशिप के लिए अप्लाई किया था लेकिन उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया था. आज वह खुद दूसरों को डीलरशिप देते हैं.

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